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Monday, July 11, 2011

अंतर्मन के प्रश्न-

(भारत देश में घटित कुछ घटनाएँ देख कर मेरा अंतर्मन अक्सर मुझसे कुछ प्रश्न करता है. ये घटनाएँ तरह तरह की घटनाएँ है; भ्रष्टाचार, दागी मंत्री और सांसद, हिन्दू-मुस्लिम दंगें, काला धन… परन्तु अंतर्मन का प्रश्न सिर्फ एक है की देश में इतना कुछ हो रहा है पर मैं क्यों मौन हूँ, मेरी कलम क्यों मौन है? प्रस्तुत है कुछ छंद…)

कोई बन रहा है तस्कर, कोई बन रहा लुटेरा
कोई कह रहा है अपने आप को डॉन है
किसी पे मुक़दमे है हत्या और बलात्कार के,
तो कोई बच्चों का भी करता शोषण यौन है
बैठे है वो सब सत्ता के गलियारों में,
और कहते है वो हमको पकड़ने वाला कौन है
दागियों का इतना है जोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
ऐसे नेताओं के खिलाफ तेरी लेखनी क्यों मौन है.

जनता कर रही है त्राहि माम- त्राहि-माम,
पर भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता मदहोश है
खून चूस कर जनता का ऐसे डाल दिया,
कि फूटा हुआ जन- जन में आक्रोश है
कानून की तो उड़ा रहे वो धज्जियां,
और कर डाला संविधान को बेहोश है
अंधियारों का ना कोई छोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
ऐसी सत्ता के विरुद्ध तेरी वाणी क्यों खामोश है.

जल रहा है मुल्क आज मजहब की आग में,
दरबारों ने देश में ये बीज कैसे बोये है
खेल हुआ है ये कैसा नरसंहार का,
कि बूढ़े बापों के कन्धों ने भी बेटे अपने ढोये है
तार-तार हो रहा है देश प्रेम भारती का,
देख-देख पर्वत और सागर भी तो रोये है
हर तरफ मचा है शोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
तेरी अंखियों के आज आंसू कहाँ खोये है.

करने चोरियों को, भरने तिजोरियों को,
देखो शासकों के कैसे हौंसलें बुलंद है
भरी हुई है गंदगियाँ इतनी सरकारों में,
की राजभवनों से भी आ रही है दुर्गन्ध है
कानों में ऊँगली डाल प्रशासन तो बहरा हुआ,
और काली पट्टी बाँधे कानून तो अंध है
तुझसे पूछती है भोर, जवाब दे ‘विभोर’,
सच्चाई को बोलने को तेरी बोलती क्यों बंद है.

-विभोर गुप्ता

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