नमस्कार...
मैं विभोर गुप्ता आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ | इस ब्लॉग पर आपको मेरी काव्य रचनाओं का संग्रह मिलेगा |
मेरी वेबसाइट पर जाने के लिए क्लिक करे www.vibhorgupta.webs.com
अगर आपको मेरा ब्लॉग अच्छा लगा तो आप इसे follower पर क्लिक कर follow कर सकते है | मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा |
धन्यवाद |
Monday, December 19, 2011
Thursday, December 15, 2011
कोटि-कोटि नमन-
आज विजय दिवस पर उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि स्वरुप एक मुक्तक, जिन्होंने 1971 के युद्ध में अपने आप को देश के लिए न्यौछावर कर दिया था|
कोटि-कोटि नमन है, जिन्होंने अपनी जान गंवाई थी
भारत माँ की रक्षा की खातिर सीने पर गोली खायी थी
इस धरती के लिए कितना शुभ मंगल दिन होगा वो
जब बलिदानी माँ की कोखों ने ऐसी संताने जन्माई थी|
-विभोर गुप्ता
कोटि-कोटि नमन है, जिन्होंने अपनी जान गंवाई थी
भारत माँ की रक्षा की खातिर सीने पर गोली खायी थी
इस धरती के लिए कितना शुभ मंगल दिन होगा वो
जब बलिदानी माँ की कोखों ने ऐसी संताने जन्माई थी|
-विभोर गुप्ता
Wednesday, November 30, 2011
जागो कलमकारों
देश में आज-कल का माहौल ही कुछ ऐसा ही कि लिखना पड़ रहा है.......
राजशाह लूट-लूट खजाना अपने तहखानें भर रहे है,
जागो कलमकारों, अपनी कलम से अब देश जगाओ
अरे, वतन के ठेकेदार, वतन का सौदा कर रहे है |
-विभोर गुप्ता
Saturday, November 26, 2011
सरदारनी ने जन्म दिया
26 नवम्बर 2008 में मुंबई में आतंकी हमले के बाद भी भारतीय प्रधानमंत्री के खून गरम नहीं होने पर मैंने एक छंद लिखा था| आज तीन साल बाद उसे आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ|
सरदारनी ने जन्म दिया, सरदारनी का दूध पिया,
......................सरदारनी के आँचल की छाँव तुम पले हो
पगड़ी बाँध बन जट, सिंह उपनाम रख,
.....................गुरु गोविन्द के अनुयायियों का वेश तुम ढले हो
आन-बान-शान पर जान को लुटाने वाले
....................सिक्खों का इतिहास भूल किस हाथ तुम छले हो
कैसा ये तुम्हारा राज, कहाँ है कृपाण आज,
...................शौर्य को ठुकराकर कायरता की किस राह तुम चले हो |
-विभोर गुप्ता
सरदारनी ने जन्म दिया, सरदारनी का दूध पिया,
......................सरदारनी के आँचल की छाँव तुम पले हो
पगड़ी बाँध बन जट, सिंह उपनाम रख,
.....................गुरु गोविन्द के अनुयायियों का वेश तुम ढले हो
आन-बान-शान पर जान को लुटाने वाले
....................सिक्खों का इतिहास भूल किस हाथ तुम छले हो
कैसा ये तुम्हारा राज, कहाँ है कृपाण आज,
...................शौर्य को ठुकराकर कायरता की किस राह तुम चले हो |
-विभोर गुप्ता
Sunday, November 13, 2011
अपने छोटू का बाल दिवस
आज सुबह सुबह बाल दिवस के दिन जब मैंने कुछ छोटे छोटे बच्चों को दुकानों पर काम करते देखा तो मुझे लगा कि देश कि उन्नति और विकास का उन बच्चों का क्या लाभ मिल रहा है? एक ताजी रचना आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ, आपकी प्रतिक्रिया आमंत्रित है|
और कुछ सालों से अर्थव्यवस्था का सूचकांक भी ऊपर चढ़ा है
वास्तव में अब गाँव की गलियों तक भी काली सड़कें आती है
और अब गोरी भी गगरी लेकर पानी भरने दूर नहीं जाती है
देश का नेता हर नुक्कड़ पर विकास के ढोल बजाता है
किन्तु अपना छोटू तो आज भी हवेली में ही झाडू लगाता है |
अब तो हर बच्चे को मिला हुआ शिक्षा का अधिकार है
सस्ते दामों पर कंप्यूटर उपलब्ध करा रही सरकार है
विदेशी विश्वविधालय देश में अपनी शाखाएं खोल रही है
नई पीढियां एक साथ कई-कई भाषाएँ बोल रही है
गली-गली में सर्व शिक्षा अभियान की किरण दिखाई देती है
किन्तु अपने छोटू को तो बस मालिक की डांट सुनाई देती है |
महात्मा गाँधी के नाम पर गारंटीड रोजगार मिलता है
बड़े बाबू को भी अब वेतन तीस हज़ार मिलता है
अब कोई किसी को भी कम मजदूरी पर नहीं रख सकता है
और बंधुआ मजदूर भी श्रम विभाग में केस दर्ज कर सकता है
किन्तु बाल श्रम निरोधक कानून उस समय कहाँ सोता है
जब अपना छोटू चाय की दुकान पर झूठे बर्तन धोता है |
-विभोर गुप्ता
Tuesday, October 25, 2011
दीपों की रहे जगमग
दीपों की रहे जगमग, जीवन में ना अँधेरा हो
माँ लक्ष्मी का आपके घर आँगन में बसेरा हो
धन, वैभव, ऐश्वर्य, पैसे की ना कोई कमी हो
उल्लास, आनन्द, तेज, ज्ञान के आप धनी हो
सुख, समृद्धि, सम्पन्नता दस्तक दे आपके द्वार
दीपावली के पर्व पर आपको खुशियाँ मिले अपार.
ऐसी ही कामनाओं के साथ आपको एवं आपके परिवार को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ...
-विभोर गुप्ता
Wednesday, October 5, 2011
दशरथ-नंदन अवतार नहीं धरता-
विजयादशमी के पावन अवसर पर मेरे पास इससे अच्छी कोई रचना नही है. कृपया अपनी प्रतिक्रियाएं देकर इस रचना को सुभाशीष प्रदान करे.
मेरे देश की भूमि भयभीत है दानवों के आतंक से,
फिर भी कोई दशरथ-नंदन यहाँ अवतार नहीं धरता
फिर भी कोई दशरथ-नंदन यहाँ अवतार नहीं धरता
मशालों पर भी कहर बन जाती है निशाचरों की भीड़,
पुतले जलाने से रावन का वंश कभी मिटा नहीं करता
आज भी जाने कितने सीता-हरण होते है देश में
कितने रावण ढोंग करते है पाखंडियों के वेश में
स्वर्ण-मृग बन मारीच फिर जानकियों को ललचाता है
कितनी सीताओं की मर्यादाओं पर काल मंडराता है
धन और बल की आड़ में निर्भीक बन गए है रावण,
खींच लो कितनी भी, किसी लक्ष्मण रेखा से नहीं डरता
मेरे देश की भूमि भयभीत है दानवों के आतंक से,
फिर भी कोई दशरथ-नंदन यहाँ अवतार नहीं धरता
कुम्भकर्णों के पेट भरे किन्तु फिर भी खा रहे है
बच्चें बिलखते भूख से, पर वो दूध से नहा रहे है
तिजोरियां भर, सात पीढ़ियों के लिए सपने संजोते है
भले प्रजा चीखती रहे, वो महलों में चैन से सोते है
चारा, यूरिया, ताबूत, स्पेक्ट्रम जाने क्या-क्या खाया,
कितना भी खा ले किन्तु कुम्भकर्णों का पेट नहीं भरता
मेरे देश की भूमि भयभीत है दानवों के आतंक से,
फिर भी कोई दशरथ-नंदन यहाँ अवतार नहीं धरता
इन्द्रजीत ने बाँध दिया है देवों को बंधन में
आज जहरीले सर्पों ने विष घोल दिया है चन्दन में
धर्म-अधर्म के युद्ध में, अधर्म का पलड़ा भारी है
निष्ठावादियों की सेनायें, भ्रष्ट कपटियों से हारी है
आज कोई विभीषण भी तो नहीं, जो भेद ही बतला दे,
बार-बार शीश काटने पर भी दशानन नहीं मरता
मेरे देश की भूमि भयभीत है दानवों के आतंक से,
फिर भी कोई दशरथ-नंदन यहाँ अवतार नहीं धरता
-विभोर गुप्ता
Subscribe to:
Posts (Atom)