नमस्कार...


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Monday, August 15, 2011

जश्न-ए-आजादी-



Saturday, August 13, 2011

राखी की कीमत-


एक बहन अपने भाई को राखी बांधती है, भाई अपनी बहन से पूछता है कि उसे क्या उपहार चाहिए. बहन कहती है...

ना पैसा माँगू, ना कंगन माँगू, ना माँगू बाईक या कार कोई
भैया मेरे, इस रक्षाबंधन, ना देना मुझको उपहार कोई
कदम-कदम पर हवस के शिकारी, जो घात लगाये बैठे है
बस उनके आघातों से बचने का, दे दो मुझको उपचार कोई

चाहे पैदल चलूँ या रिक्शा में, बस में हूँ या रेलों में
सडकों पर रहूँ या मैदानों में, बाजारों में हूँ या मेलों में
इक्कीसवीं सदीके समाज की कामुक नजरें जब मुझ पर टिकती
इंसानी पशुओं की देख शरारत तब मेरी साँसें तक रूकती 
लगता है मुझको जैसे धरा पर छाने वाला है अंधकार कोई
भैया मेरे, इस रक्षाबंधन, ना देना मुझको उपहार कोई
बस हैवानी नज़रों से बचने का दे दो मुझको उपचार कोई

ऑफिस में मेरा बॉस मुझको अपने केबिन में बुलाता कितनी बार
किसी न किसी बहाने से मुझे छूने की कोशिश करता कितनी बार
सीनियर हो या जूनियर हो, अब नहीं है किसी को लाज कोई
बहनें तो सबकी होती है, भला क्यों नहीं समझता आज कोई
कितना भी लज्जित कर लो, होता नहीं है शर्मशार कोई
भैया मेरे, इस रक्षाबंधन, ना देना मुझको उपहार कोई
बस हैवानी नज़रों से बचने का दे दो मुझको उपचार कोई

पढ़ा-लिखा सभ्य समाज भी जब अश्लील कमेंट्स करता है
तब मेरी आँखों में क्रोध की ज्वाला का जहर भरता है
किस-किस को बातें सुनाऊँ यहाँ सब के सब तो बहरें है
सभी की बहनों पर, किसी न किसी की नज़रों के पहरें है
छेड़खानी की इन हरकत पर, स्त्री की क्यूं लाचार कोई
भैया मेरे, इस रक्षाबंधन, ना देना मुझको उपहार कोई
बस हैवानी नज़रों से बचने का दे दो मुझको उपचार कोई

बाँध रही हूँ राखी तुमको, बस इतना सा वचन देना तुम 
पराई स्त्री को भी अपनी माता और बहन मान लेना तुम 
इतना सा वचन निभाना, राखी का सारा क़र्ज़ उतर जायेगा
और सभी ऐसा समझने लगे, तो ये समाज भी सुधर जायेगा
अपनी राखी की कीमत माँगूं, माँग रही ना अधिकार कोई
भैया मेरे, इस रक्षाबंधन, ना देना मुझको उपहार कोई
बस हैवानी नज़रों से बचने का दे दो मुझको उपचार कोई.

Friday, August 5, 2011

सरकारी जनलोकपाल की प्रति अब हम जलाएंगे


जनलोकपाल मुद्दे पर अब सडकों पर उतर आयेंगे
सरकारी जनलोकपाल की प्रति अब हम जलाएंगे


जनलोकपाल कानून पर संसद क्या बहस करेगी
सख्त हुआ कानून तो नेताओं की कैसे जेब भरेगी
जब संसद में राजा, कलमाड़ी जैसे तस्कर बैठे हो
स्विस बैंकों में काले पैसे की तिजोरी भरकर बैठे हो
ऐसे सांसद क्या भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनायेंगे 
सांसदों को छोडो अब तो हम ही हंगामा मचाएंगे
जनलोकपाल मुद्दे पर अब सडकों पर उतर आयेंगे
सरकारी जनलोकपाल की प्रति अब हम जलाएंगे


सरकारी बिल में सारे समाजसेवी संगठन तो आते है
पर आधे से ज्यादा सरकारी अधिकारी नहीं आते है
पुलिस,लाईसेंस,बिजली,नगरपालिका,​सड़कें,पेंशन
शिक्षा, उधोग, अस्पताल, रोडवेज, बस की टेंशन 
ये विभाग कोई भी लोकपाल दायरे में ना आयेंगे
इन समस्याओं के निदान को भला हम कहाँ जायेंगे
जनलोकपाल मुद्दे पर अब सडकों पर उतर आयेंगे
सरकारी जनलोकपाल की प्रति अब हम जलाएंगे


प्रधानमंत्री कोई घोटाला करता है तो करने दो
सी. बी. आई. को ही बस उसकी जांच करने दो
जज रिश्वत लेकर न्याय सुनाये, कोई बात नहीं
सांसदों का व्यवहार भी लोकपाल के हाथ नही
आधे सदस्य तो समिति में सत्ता पक्ष से जायेंगे
न्याय मांगने वाले क्या भैंस के आगे बीन बजायेंगे
जनलोकपाल मुद्दे पर अब सडकों पर उतर आयेंगे
सरकारी जनलोकपाल की प्रति अब हम जलाएंगे
-विभोर गुप्ता

Sunday, July 24, 2011

भूमि अधिग्रहण-


आखिर कैसी है ये सब नीतियाँ सरकार की
नहीं है चिंता कोई किसानों के रोजगार की
विकास की दौड़ में ये रुख कहाँ मोड़ दिया
भू-रक्षकों का भूमि से ही नाता तोड़ दिया
वो जो  बनकर अन्नदाता, मानवता दिखलाते रहे
देश को पालने को, अपना खून पसीना बहाते रहे
देकर लालच उन्ही को, उन्ही की जेबें ली खंगाल
हड़प कर जमीं उनकी, कर दिया सबको कंगाल
ये कैसा विकास है, ये कैसा शहरीकरण है
कृषि योग्य भूमि का ही हो रहा अधिग्रहण है
महल खड़े करने है आपको शौक से कीजिये
देने है आवास सभी को, गर्व से दीजिये
पर उस जमीं पर क्यों, जहाँ फसलें लहराती है
एक अनपढ़ को भी अन्नदाता का एहसास कराती है
जहाँ बैसाख में गेंहू की सुनहरी बालियाँ चमकती है
तो बरसात के बाद बासमती की खुशबू महकती है
वो चने की खन- खन वो गन्ने के खेत
अब क्यूं नजर आ रही है वहां उडती हुई रेत
जिस खेत की मिटटी, सोना है उगलती
उसी मिटटी को आज, विषैली नागिनें है निगलती
बोलते हो तुम हम सड़कें है बना रहे
सड़कें बनने के फायदे भी तुम गिना रहे
पर क्या तुम सोचते हो, तुम कितनो को उजाड़ रहे
भविष्य ना जाने, कितनो का बिगाड़ रहे
आज भले ही लालच देकर, डाल रहे हो फूट
कल कहीं वो ही ना करने लगे उसी सड़कों पर लूट
तुम जो आज कृषि भू पर इमारतें हो चिन रहे
सच तो यह है, हजारों लोगों के रोजगार है छिन रहे
कृषि भूमि छीन कर काट रहे हो किसानों के हाथ क्यूं
पीठ पर भले ही मारो पर पेट पर लात क्यूं
ख़ुशी मना लो आज, कल तुम भी पछताओगे
नहीं रहेगी जमीं तो फिर अन्न कहाँ उगाओगे
पैसा तो रहेगा खूब, पर होगी नहीं रोटी तब
खिलाओगे क्या उसको, रोटी होगी बेटी जब
वक़्त अभी भी है अन्न की कमी से बचने का
विकास से पहले भविष्य के बारे में सोचने का
लाओ नये कानून, बंद करो अब दलाली को
फूलों को उजाड़कर न रुलाओ चमन के माली को
किसान नहीं बहाता पसीना, अपने पेट के लिए
वो पैदा करता है अन्न, पूरे देश के लिए
उसी अन्नदाता के साथ ये अन्याय क्यूं हो रहा
शहरीकरण की दौड़ में वो अपने खेत क्यूं खो रहा
नहीं है मेरा प्रश्न किसी देश या प्रदेश सरकार से
कर रहे जो भू दलाली या किसी ठेकेदार से
मैं तो पूछता हूँ केवल बुद्धिजीवी समाज से
किसी भविष्य से नहीं बल्कि वर्तमान आज से
मानता हूँ है जरूरत आवास और मकान की
सड़कें, कारखानें, शोपिंग माल और दुकान की
पर क्या इन सब के लिए बंजर कर दे जमीं
कृषि योग्य भूमि की क्या कोई जरूरत नहीं
जिस तरह से जनसँख्या देश की है बढ़ रही
बेलगाम महंगाई दिन-प्रतिदिन है चढ़ रही
पर राहू के हाथो ये कैसा चंद्रग्रहण हो रहा
सोना उगलती जमीन का क्यों अधिग्रहण हो रहा
अब तो उपजाऊ जमीं का अधिग्रहण बंद कीजिये
देश की अन्न भूमि का दलालिकरण बंद कीजिये.
- विभोर गुप्ता

Saturday, July 16, 2011

RSS का हाथ-


अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी की मीटिंग चल रही थी, मुद्दा था, कहाँ-कहाँ है RSS का हाथ? दिग्विजय सिंह उस मीटिंग का संचालन कर रहे थे. दिग्विजय सिंह बता रहे थे कि RSS का हाथ अन्ना हजारे के पीछे है, बाबा रामदेव के पीछे है, बीजेपी के पीछे भी है. तभी एक कार्यकर्ता बोला, वो देखो वहां भी है RSS का हाथ!!! दिग्ग्विजय बोले, कहाँ? कार्यकर्ता इशारा करते हुए बोला, वहां. दिग्विजय बोले,  अबे चुप, ये RSS का हाथ नहीं, कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह है, पंजा!!!

-विभोर गुप्ता 

Friday, July 15, 2011

अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

(मित्रों, क्षमा चाहता हूँ कि आज एक ऐसी रचना पोस्ट कर रहा हूँ, जिसमे से कायरता की बू आ रही हो. पर मजबूरी है, ऐसा लिखना पड़ रहा है, क्योंकि हमारी सरकार और हमारे कानून तो आतंकियों को सजा नहीं दिला सकते है. आप सभी जानते ही है कि अजमल कसाब और अफजल गुरु के साथ क्या हो रहा है....अगर मैंने कुछ सच लिखने की कोशिश की हो या आप मुझसे सहमत हो तो मुझे बताये, आपके सुझाव एवं प्रतिक्रिया का स्वागत है....) -विभोर गुप्ता

एक और मुद्दा राजनीतिक केंद्र बनने को तैयार है
एक बार फिर मुंबई पर हुआ आतंकियों का वार है
फिर ना कहीं आतंकी दोषियों पर सियासत गरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

वैसे भी, आजकल देश में महंगाई का दौर बढ़ा है
इन दिनों मुर्गों और बकरों का भाव भी चढ़ा है
फिर ना कोई जेलों में ताजा चिकन-बिरयानी खाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आवाम देश की गरीबी, भूखमरी से जूझ रही है
और सिंहासन को दोषियों को पकड़ने की सूझ रही है
फिर ना किसी की सुरक्षा पर करोड़ों-अरबों रूपये बहायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आतंकी हमले के दोषी को पकड़ने से भी क्या होगा
चलेंगे सालो साल मुक़दमे, इससे ज्यादा क्या होगा
फिर ना जेल में कोई आतंकी बेख़ौफ़ आराम फरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

अफजल को फांसी मुक़र्रर, मिली नहीं अब तक भी
आतंक से थर्राया देश, पर सत्ता हिली नहीं अब तक भी
फिर अफजल, कसाब जैसे कानून को ठेंगा दिखलायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए.
-विभोर गुप्ता