नमस्कार...


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Saturday, June 18, 2011

छंद (राहुल-विवाह)-


वरुण की शादी होने के बाद, ताई जी ने कहा
        बेटा राहुल, अपनी शादी तुम कब करवाओगे
तुम्हारे कुंवारेपन पर, मुझे ताने मरते है सब
        बोलो सुसंस्कारी, सुलक्ष्मी बहु कब लाओगे
तुम्हारी उम्र की सब लडकियाँ ब्याही गयी
        क्या सभी के बच्चों के मामा तुम ही कहलाओगे
कर लो शादी जल्दी प्यारे, ताक में है कवि सारे
        खुद को क्या दूसरा अटल बिहारी लिखवाओगे.

क्षमा करना मम्मी जी, मैं दर्द आपका हूँ समझूं
        पर क्या करूँ, कोई लड़की मुझको जंचती ही नही है
राजनीति भी करे और संभाले जो राज-पाट
        ऐसी गुणवान कोई दिल में मेरे बसती ही नही है
जिसको बना डालूँ आपके घर की बहुरानी
        ऐसी कोई सुकुमारी मेरी तरफ हंसती ही नहीं है
मैं तो डालता हूँ दाना कुड़ियों को रात-दिन
         पर कन्या कुंवारी कोई जाल में फंसती ही नही है.

-विभोर गुप्ता (9319308534)

Friday, June 17, 2011

शराब-



जब थे कभी अनजान इससे, तब लुभाया शराब ने
जो नही किया था वादा कभी, वो भी निभाया शराब ने

हम तो जिया करते थे तन्हा ही, जिन्दगी को
ना जाने किन-किन चेहरों से मिलवाया शराब ने

नही था कोई जूनून, कुछ सिखने का दिल में,
तब इस दिल को, जाने क्या-क्या सिखाया शराब ने

शौक से जिया करते थे अपने गली-मोहल्लों में,
अपनी गलियीं का भी रस्ता, भटकाया शराब ने

मानते थे लोहा सभी हमारे हिसाब-किताब का,
दो पैग के बाद, गिनतियों को भी भुलाया शराब ने

जहाँ तैरने की कोशिश भी नही, कर सकते थे हम,
उस बीच मझधार में ले जाकर, डुबाया शराब ने

कभी मेरी ताकत का खौफ, तो कभी जमींदारी का रौब,
मेरी जवानी, मेरी कहानी, सब कुछ लुटवाया शराब ने

गर्व से रखा था नाम हमारा, माँ-बाप ने,
शराबी, पियक्कड़, बेवडा नाम दिलाया शराब ने

किसी-किसी को तो दुनिया से ही उठाती शराब है,
पर हमको तो नज़रों में उनकी गिराया शराब ने

हम तो किया करते थे, हमेशा ही परहेज इन सबसे
सीधा-सादे 'विभोर' को शायर बनाया शराब ने

भले ही हिन्दू-मुस्लिम को हो मिलाया शराब ने,
पर अपने सगों को तो बनाया, पराया शराब ने

Thursday, June 16, 2011

तेरी किस्मत

ऐसे क्या तू देखता है, कुएं तेरी किस्मत में है
कोसता किसको है क्या, संघर्ष तेरी किस्मत में है

मंजिल तेरी है चाँद पर, चलना तुझे धरती से है
ना मांग फूलो की सेज, कांटें तेरी किस्मत में है

पंख की तू चाह ना कर, बुलंद कर अपने आप को
भूल जा राहों को गिनना, भटकन तेरी किस्मत में है

आत्मविश्वास की इस डोर में, ना डाल कोई गांठें कभी
उठने की तू आदत बना ले, गिरना तेरी किस्मत में है

चुपचाप यूं ना बैठ तू, दिल की उम्मीदे हार कर
मिलकर तुझको रहेगा, जो भी तेरी किस्मत में है

छोड़ दे आदत पुरानी, हर चीज को ही लपकने की
रख तू अभी पेट खाली, धक्के खाना तेरी किस्मत में है

रुकने का तू नाम ना ले, बस चलता ही चल 'विभोर'
एक बात तू समझ ले, बदकिस्मती तेरी किस्मत मैं है।

-विभोर गुप्ता

Sunday, June 12, 2011

तानाशाही सत्ता की जय हो


 अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा
भ्रष्टाचार और कालेधन पर अपना मुंह नही खोलूँगा

अरे, मुझको भी तो अपनी जान बहुत प्यारी है
सच लिखने की ताकत मेरी, सत्ता के आगे हारी है
तो भला मैं, क्यूँ सच बोल कर अपना शीष कटाऊ
अमानवीय सरकार को भला क्यूँ अपना दुश्मन बनाऊ

जो सत्ता सोये हुए लोगो पर लाठी बरसा सकती है
न्याय की प्यासी जनता को बूँद-बूँद तरसा सकती है
जिसने सत्याग्रह का अर्थ ही कभी ना जाना हो
लोकतंत्र में जनता की पुकार को कभी ना माना हो

जिसे दुनिया ने पूजा सदा, वो उसको ठग बतलाती है
आधी रात को लाठिया बरसा मन ही मन मुस्काती है
वो सत्ता भला कलम की ताकत को क्या जानेगी
भ्रष्टाचार से पीड़ित प्रजा के आंसू क्या पहचानेगी

सत्ता के धर्म-अधर्म को अपनी कलम से नही तोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा

आज चली है लाठिया, कल गोली भी चलवा सकते है
सच लिखने के अपराध में मुझे भी अन्दर करवा सकते है
तानाशाह हो चुकी सरकार अब प्रजातंत्र को भूल रही
भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार, सत्ता के मद में झूल रही

सिंहासन का राजा कोई, बागडोर किसी और के हाथ में
खरगोशों का शिकार कर रहे, सिंह-सियार दोनों साथ में
कसाब खा रहा बिरयानी, सत्याग्राही लाठिया है खा रहे
देश में आतंक फ़ैलाने वाले, लादेन जैसे सत्ता को भा रहे

सात समंदर पार, सत्ता के दलालों की भर रही है तिजोरिया
और एक योगगुरु को द्रोही बतलाकर कर रहे वो मुंहजोरिया
अब तो लगता है डर, कहीं ना कर दे मुझको भी बदनाम
मैं क्यूँ पडू इस झंझट में, करूँगा मैं सत्ता को सलाम

सिंहासन के फेंके सिक्कों पर, अब तो मैं भी डोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा

अपनी जेब भरने को, मैं दरबारों की जेबे टटोलूँगा
अपनी कडवा सच की कविताओं में झूठ की मिश्री घोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा
भ्रष्टाचार और कालेधन पर अपना मुंह नही खोलूँगा

-विभोर गुप्ता (9319308534)

Wednesday, June 1, 2011

भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह

सत्याग्रह है एक युद्ध, काले धन के विरुद्ध
         इस युद्ध में जीवन आहुतियाँ डालने चलो
घायल  माँ भारती, आज तुम्हे पुकारती
         भारती के पैर के कांटे निकालने चलो
जागो युवा नौजवानों, शूरवीर बलवानों
         सिंहासन की बागडोर तुम सँभालने चलो
लगी है दावानल आग, देश के भविष्य जाग
         मिटाना है अँधियारा तो आग उछालने चलो

काँप उठा है आज कंस, खत्म करो उसका वंश
         सुदर्शन चक्र लेकर कृष्ण भगवान चलो
पाप का नाश करो, जन-जन में उल्लास भरो
        रावण की लंका जलाने को हनुमान चलो
अधर्म के विरुद्ध जंग, बाबा रामदेव के संग
        लालबहादुर कह रहे, जवान और किसान चलो
क्रांति की चली हवा, हर तरफ है धुंआ
        परिवर्तन चाहते हो तो रामलीला मैदान चलो

-विभोर गुप्ता (9319308534)

Sunday, May 29, 2011

बदनाम जिन्दगी

मैं ये तुमको क्या बताऊँ, जिन्दगी किसके नाम है,
समझना है तो यूं समझ लो, जिन्दगी बदनाम है

वक़्त है ठहरा, है ठहरें जमीं और आसमां
दिन निकलता ही नहीं, हर पल यहाँ बस शाम है

सोचा उनको तो सुना दें, हाल दिल की बेबसी का,
सुनकर वो हंसने लगे, ये तो किस्सा-ए-आम है

छाई थी एक खुमारी, उनके आँखों के नशे की,
पर वो तो ये समझ लिए, पिये हुए हम जाम है
- विभोर गुप्ता

Sunday, May 15, 2011

चौ. महेंद्र सिंह टिकैत को समर्पित


बाबा, आखिर तुम  हमें छोड़  कर चले गये
कैंसर  की बीमारी के हाथों, आखिर छले गये

सत्ता-सिंहासन की लाठी के आगे भी तुम थे कभी डरे नही
लाखों चोटें खायी, पर  आँखों से आंसू कभी भी झरे नही
कीमत लाख लगायी भले हो,  तुम थे जो कभी बिके नही
शासन ने कितना ही हो झुकाया, तुम थे जो कभी झुके नही
तुम्हारे पालन में, गरीब किसान थे पले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

किसानो के मसीहा थे तुम,  दर्द था तुमने खूब पहचाना
किसानो के हक़ में, कभी धरने  देना, कभी लाठी खाना
मंच पर खड़े होकर, किसान-क्रांति का वो बिगुल बजाना
अपनी हठ-जिद के आगे, प्रशासन को नाको चने चबाना
किसान-संघर्ष को छोड़, क्यों तुम चले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा, तुम   बिन सूना  किसान-भवन,  है तुम्हे पुकार रहा
आ जाओ एक बार फिर, किसान दलालों से फिर है हार रहा
हुक्के की  गुड-गुड, पत्तल  का खाना,  तेरी राह निहार रहा
लौट के आजा फिर से बाबा, अँधेरा फिर दीपक को मार रहा
आँखों में  छोड़ आंसू,  तुम  तो  भले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा छोड़ गये हमको, लगा जैसे एक युग का अंत हुआ
आंसू  झरने लगा  है श्रावन,  पतझड़  जैसा  बसंत हुआ
किसान चेतना को भभकाकर, अमर कोई एक पंथ हुआ
जनसैलाब को दे सन्देश, विदा दुनिया से कोई संत हुआ
लगता है सूर्यदेव, नील गगन में  ढले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा, आखिर तुम  हमें छोड़  कर चले गये
कैंसर  की बीमारी के हाथों, आखिर छले गये