नमस्कार...


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Saturday, July 16, 2011

RSS का हाथ-


अभी हाल ही में कांग्रेस पार्टी की मीटिंग चल रही थी, मुद्दा था, कहाँ-कहाँ है RSS का हाथ? दिग्विजय सिंह उस मीटिंग का संचालन कर रहे थे. दिग्विजय सिंह बता रहे थे कि RSS का हाथ अन्ना हजारे के पीछे है, बाबा रामदेव के पीछे है, बीजेपी के पीछे भी है. तभी एक कार्यकर्ता बोला, वो देखो वहां भी है RSS का हाथ!!! दिग्ग्विजय बोले, कहाँ? कार्यकर्ता इशारा करते हुए बोला, वहां. दिग्विजय बोले,  अबे चुप, ये RSS का हाथ नहीं, कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह है, पंजा!!!

-विभोर गुप्ता 

Friday, July 15, 2011

अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

(मित्रों, क्षमा चाहता हूँ कि आज एक ऐसी रचना पोस्ट कर रहा हूँ, जिसमे से कायरता की बू आ रही हो. पर मजबूरी है, ऐसा लिखना पड़ रहा है, क्योंकि हमारी सरकार और हमारे कानून तो आतंकियों को सजा नहीं दिला सकते है. आप सभी जानते ही है कि अजमल कसाब और अफजल गुरु के साथ क्या हो रहा है....अगर मैंने कुछ सच लिखने की कोशिश की हो या आप मुझसे सहमत हो तो मुझे बताये, आपके सुझाव एवं प्रतिक्रिया का स्वागत है....) -विभोर गुप्ता

एक और मुद्दा राजनीतिक केंद्र बनने को तैयार है
एक बार फिर मुंबई पर हुआ आतंकियों का वार है
फिर ना कहीं आतंकी दोषियों पर सियासत गरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

वैसे भी, आजकल देश में महंगाई का दौर बढ़ा है
इन दिनों मुर्गों और बकरों का भाव भी चढ़ा है
फिर ना कोई जेलों में ताजा चिकन-बिरयानी खाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आवाम देश की गरीबी, भूखमरी से जूझ रही है
और सिंहासन को दोषियों को पकड़ने की सूझ रही है
फिर ना किसी की सुरक्षा पर करोड़ों-अरबों रूपये बहायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

आतंकी हमले के दोषी को पकड़ने से भी क्या होगा
चलेंगे सालो साल मुक़दमे, इससे ज्यादा क्या होगा
फिर ना जेल में कोई आतंकी बेख़ौफ़ आराम फरमाए
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए

अफजल को फांसी मुक़र्रर, मिली नहीं अब तक भी
आतंक से थर्राया देश, पर सत्ता हिली नहीं अब तक भी
फिर अफजल, कसाब जैसे कानून को ठेंगा दिखलायें
इससे तो अच्छा है हमलावर दोषी पकडे ही ना जाए.
-विभोर गुप्ता

Wednesday, July 13, 2011

जीवन के छब्बीस वर्षों में-

(आज जब मैंने अपने जीवन के छबीस बसंत पूरे कर लिए है, तो आज मैं पीछे मुड कर देखता हूँ और सोचता हूँ, कि पिछले छब्बीस सालों में मैंने क्या खोया और क्या पाया? प्रस्तुत है अंतर्मन की एक रचना, अपने जन्म-दिवस के मौके पर…..)

क्या खोया और क्या पाया, जीवन के छब्बीस वर्षों में
किससे कितना क्या लिया-दिया, जीवन के छब्बीस वर्षों में

माँ की ममता अपार मिली, पिता का भरपूर प्यार मिला
भाई बहन के स्नेह से मुझको रंग बिरंगा संसार मिला
दादी दादा का दुलार सही, सब रिश्तेदारों का लाड मिला
सब यारों ने प्रीत निभाई, सभी से सहयोग बे-आड़ मिला
खुशियाँ इतनी बटोरी मैंने, जीवन के छब्बीस वर्षों में
जगह नही थी रखने को भी, जीवन के छब्बीस वर्षों में
किस्मत का भरपूर धनी हूँ, जीवन के छब्बीस वर्षों में
सभी के उपकारों का मैं ऋणी हूँ, जीवन के छब्बीस वर्षों में

पाने-लेने की बात करूँ, तो मेरी बांछें खिल जाती है
पर जब देने का चर्चा हो, तो रूह तक मेरी हिल जाती है
जीवन के छब्बीस साल खो दिए, माँ-बाप को आंसू देने में
जिससे जितना लिया है मैंने, कसर नहीं छोड़ी उनको गम देने में
झूठे वादों के गुलदस्तें थमाए, जीवन के छब्बीस वर्षों में
ना पूछो किस-किस को लूटा मैंने, जीवन के छब्बीस वर्षों में
ना जाने कितनों के सपनो को तोडा, जीवन के छब्बीस वर्षों में
बस अपनों से ही मुंह है मोड़ा, जीवन के छब्बीस वर्षों में

क्या खोया और क्या पाया, जीवन के छब्बीस वर्षों में
किस्से कितना क्या लिया-दिया, जीवन के छब्बीस वर्षों में.

Monday, July 11, 2011

अंतर्मन के प्रश्न-

(भारत देश में घटित कुछ घटनाएँ देख कर मेरा अंतर्मन अक्सर मुझसे कुछ प्रश्न करता है. ये घटनाएँ तरह तरह की घटनाएँ है; भ्रष्टाचार, दागी मंत्री और सांसद, हिन्दू-मुस्लिम दंगें, काला धन… परन्तु अंतर्मन का प्रश्न सिर्फ एक है की देश में इतना कुछ हो रहा है पर मैं क्यों मौन हूँ, मेरी कलम क्यों मौन है? प्रस्तुत है कुछ छंद…)

कोई बन रहा है तस्कर, कोई बन रहा लुटेरा
कोई कह रहा है अपने आप को डॉन है
किसी पे मुक़दमे है हत्या और बलात्कार के,
तो कोई बच्चों का भी करता शोषण यौन है
बैठे है वो सब सत्ता के गलियारों में,
और कहते है वो हमको पकड़ने वाला कौन है
दागियों का इतना है जोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
ऐसे नेताओं के खिलाफ तेरी लेखनी क्यों मौन है.

जनता कर रही है त्राहि माम- त्राहि-माम,
पर भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता मदहोश है
खून चूस कर जनता का ऐसे डाल दिया,
कि फूटा हुआ जन- जन में आक्रोश है
कानून की तो उड़ा रहे वो धज्जियां,
और कर डाला संविधान को बेहोश है
अंधियारों का ना कोई छोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
ऐसी सत्ता के विरुद्ध तेरी वाणी क्यों खामोश है.

जल रहा है मुल्क आज मजहब की आग में,
दरबारों ने देश में ये बीज कैसे बोये है
खेल हुआ है ये कैसा नरसंहार का,
कि बूढ़े बापों के कन्धों ने भी बेटे अपने ढोये है
तार-तार हो रहा है देश प्रेम भारती का,
देख-देख पर्वत और सागर भी तो रोये है
हर तरफ मचा है शोर, तो फिर बता ‘विभोर’,
तेरी अंखियों के आज आंसू कहाँ खोये है.

करने चोरियों को, भरने तिजोरियों को,
देखो शासकों के कैसे हौंसलें बुलंद है
भरी हुई है गंदगियाँ इतनी सरकारों में,
की राजभवनों से भी आ रही है दुर्गन्ध है
कानों में ऊँगली डाल प्रशासन तो बहरा हुआ,
और काली पट्टी बाँधे कानून तो अंध है
तुझसे पूछती है भोर, जवाब दे ‘विभोर’,
सच्चाई को बोलने को तेरी बोलती क्यों बंद है.

-विभोर गुप्ता

Wednesday, July 6, 2011

माँ की सीख-

(एक बार एक लड़की ने मुझसे कहा की आप अच्छा लिखते हो. मैंने उससे कहा की कभी मुशायरे या कवि सम्मलेन में सुनने आ जाया करो, बोली की माँ ने मना किया है. मैंने कहा और क्या मना किया है माँ ने? तब उसने जो बताया, वो मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.)

किसी की चाहत की शराब, अपने होठों से तुम ना पिया करो
माँ कहती है मेरी, किसी अजनबी को अपना पता ना दिया करो

शातिर होते है दिल चुराने में, दिल की बातें लिखने वाले
मिलो किसी शायर से भले ही, पर बातें दिल की ना किया करो

रसों से भरी हुआ करती है पंक्तियाँ ग़ज़लों और गीतों की
सुनो तो गीतों को, पर गीतों के रस में डूब कर ना जिया करो

मुसाफिर है कवि और शायर तो, आज यहाँ कल कहीं और होंगे
छोड़ जायेंगे मझधार में तुमको, इन पर भरोसा ना किया करो

भौंरों की तो आदत है, फूलों और कलियों पर मंडराने की
कोई काम भले ही रुक जाये, मगर ‘विभोर’ के एहसान ना लिया करो.

-विभोर गुप्ता

Friday, July 1, 2011

कुंवारे लोग और देरी-(काल्पनिक)

कुछ साल पहले, मैं एक कार्यक्रम का संचालन कर रहा था. उस कार्यक्रम में अतिथि के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी आने वाले थे. उन्होंने अपनी राजनितिक परम्परा के अनुसार उस कार्यक्रम में चार घंटों की देरी के साथ आगमन किया. मैंने चुटकी लेते हुए कहा कि शादीशुदा मर्द देर से आये तो समझ में आता है, ये भला कुंवारे लोग क्यों देरी से आने लगे. अटल जी माइक पर आये और बोले, बेटा शादी ही तो नहीं हुई है, बाकि तो सब कुछ है.

 अभी कुछ दिन पहले मैं एक और कार्यक्रम का संचालन कर रहा था, जिसमे बहन जी मायावती जी अतिथि के रूप में आने वाली थी. वो भी उस दिन 3-4 घंटें की देरी से आई. मैंने फिर चुटकी लेते हुए कहा, कि शादीशुदा लोग देर से आये तो समझ में आता है, ये भला कुंवारे लोग क्यों देरी से आने लगे. मैंने सोचा की मायावती जी भी कुछ ऐसा ही जवाब देगी. मायावती जी मंच पर आई और बोली, लगता है अब तेरी भी मूर्तियाँ बनवानी पड़ेगी!!!

- विभोर गुप्ता

Saturday, June 25, 2011

राखी सावंत; एक अनबुझी पहेली


आज राखी सावंत के नाम से सभी लोग चिर-परिचित है, मुझे समझ नहीं आता राखी सावंत की प्रसिद्धि को क्या रूप दूँ. कुछ लोग प्रख्यात होते है, कुछ लोग विख्यात होते है, तो कुछ लोग कुख्यात भी होते है, पता नही राखी सावंत को किस श्रेणी में रखा जाये?

चाहे कुछ भी कहो कुख्यात या विख्यात, पर ये तो मानना पड़ेगा राखी सावंत ने बुलंदियों को छुआ है, नही तो 120 करोड़ की आबादी में भला ऐसी स्त्री को कौन जानता जो दिखने में स्त्री लगती भी नहीं है. राखी सावंत ने न सिर्फ बड़े पर्दों पर बल्कि छोटे पर्दों पर भी कमाल किया है, वो भी बिना किसी परदे के. और तो और टीवी चैनल्स ने तो राखी सावंत पर रियल्टी शो भी करा डाले. और नाम भी क्या रखा, राखी का इन्साफ, पता चला इंसान ही साफ़ हो गया!!!

एक दूसरा रियल्टी शो, जिसका नाम सुनकर ही लोगो को अचम्भा हुआ; राखी का स्वयंवर!!! अक्सर लोग कहते थे, अरे राखी का स्वयंवर? अरे इसका क्या स्वयंवर कराया, इस से अच्छा तो रेखा का स्वयंवर ही करा देते. और सब्जेक्ट भी कैसा कि, वो तो जब सुबह को सो कर उठती होगी, तो स्वयं ही वर लगती होगी?

मेरा एक मित्र भी गया इस रियल्टी शो में हिस्सा लेने के लिए, जैसे ही राखी सावंत ऑडिशन लेने के लिए आई, बिना मेक-अप के, मेरे मित्र ने तो राखी को देखते के साथ ही वोमिटिंग कर दी. उसके बाद 3 दिन तो वो दिल्ली के कलावती हॉस्पिटल में एडमिट रहा.

मेरे साथ एक लड़की पढ़ती थी, उसका भी नाम दुर्भाग्य से राखी सावंत ही था. पहले तो सब कुछ ठीक-ठाक था, पर बाद में जब से वो मिका वाला केस हुआ, तब से लोगो ने उसे चिढाना शुरू कर दिया, और राखी का स्वयंवर शो के दौरान तो वो बहुत ही ज्यादा परेशान हो गयी. आखिर में उसने सोचा कि अब तो अपना नाम ही बदलना पड़ेगा. वो मेरे पास आई और बोली की अच्छा सा कोई नाम बताओ, मैं परेशान हूँ राखी सावंत नाम से. मैंने सलाह दी की ऐसा कर सावंत हटा ले अपने नाम के पीछे से, राखी रहेगा तो कोई कुछ नही बोलेगा. उसने कहा ये सही है, उसने ये प्रोपोजल अपने पापा का सामने रखा तो उसके पापा भड़क गए, कि चाहे कुछ भी हो जाये, सावंत नही हटेगा. ये हमारा सरनेम है, इससे हमारे खानदान की इज्जत का पता चलता है. यहाँ तो लड़की की इज्जत खतरे में है, पर उसके पापा तो अपने खानदान की इज्जत के बारे में सोच रहे है.

वो फिर मेरे पास आई, और अपनी समस्या बताई, तो मैंने कहा कि अब तो अपना राखी नाम को ही बदल ले. पर ये क्या, राखी नाम बदलने को सुनकर उसकी मम्मी ने हंगामा शुरू कर दिया कि राखी नाम नहीं बदला जायेगा. मैंने पूछा ऐसा क्यों? बोली- इसका राखी नाम इसलिए है क्योंकि ये रक्षाबंधन के दिन पैदा हुई थी!!!

अच्छा लोजिक है. मैंने कहा- आंटी अगर ये ईद के दिन पैदा होती तो इसका नाम क्या सन्वैया रख देती? या करवा चौथ के दिन पैदा होती तो करवी सावंत? पर मेरी मित्र की मम्मी मानने के लिए तैयार ही नहीं थी. मेरी मित्र बोली, कुछ ऐसा नाम बताओ जिससे मेरे मम्मी-पापा दोनों संतुष्ट हो जाये. मैंने कहा तो तू ऐसा कर डोरी सावंत रख ले, दोनों के लिये सही रहेगा ये.

आखिर में उस लड़की ने अपना नाम राखी सावंत से बदल कर रक्षा सावंत रख लिया. प्रिय मित्रों कही आप या आप के कोई जानकर  तो ऐसी किसी समस्या से तो नही ग्रसित है? क्योंकि ये राखी सावंत नाम का एटम-बम्ब कही पर भी फूट सकता है.

कुछ दिन पहले जब सानिया मिर्जा की शादी शोएब मालिक से हुई तो बहुत लोगो के मुंह से मैंने अक्सर कहते हुए सुना कि कोई राखी सावंत को भी ले जाये. पर मैं इस बात के हमेशा ही विरोध में रहा हूँ. ये मत सोचिये कि राखी सावंत बेकार है, मैं तो सोचता हूँ कि इसे हथियार के रूप में भी इस्तमाल किया जा सकता है. मैं भारत सरकार से गुजारिश करता हूँ की राखी सावंत को जैविक हथियार घोषित किया जाये. अगर भविष्य में कोई देश हम पर हमला करे तो उस पर यह जैविक हथियार का इस्तमाल किया जाये. जिस दिन भारत सरकार राखी सावंत को जैविक हथियार घोषित कर देगी,चाइना और पाकिस्तान तो उसी दिन से भारत के आगे हाथ जोड़ कर खड़े हो जायेंगे, कि हमें माफ़ करो, चाहे हमसे अपना कश्मीर ही क्या हमारा भी कुछ हिस्सा ले लो, पर कृपया राखी सावंत तो हमारे ऊपर मत इस्तमाल करना. 

प्रिय मित्रों, ये थी राखी सावंत;एक अनबुझी पहेली, अनबुझी इसलिए क्योंकि राखी सावंत नाम की पहेली को सुलझाना मुमकिन ही नहीं, नामुनकिन है. आपको कैसा लगा, जरूर बताइयेगा, आपके सुझावों औरप्रतिक्रियाओं का स्वागत है. अगली बार फिर एक नये विषय के साथ हाजिर होंगे, तब तक के लिए जय राखी सावंत!!!

- विभोर गुप्ता (www.vibhorgupta.webs.com)