नमस्कार...


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Thursday, June 16, 2011

तेरी किस्मत

ऐसे क्या तू देखता है, कुएं तेरी किस्मत में है
कोसता किसको है क्या, संघर्ष तेरी किस्मत में है

मंजिल तेरी है चाँद पर, चलना तुझे धरती से है
ना मांग फूलो की सेज, कांटें तेरी किस्मत में है

पंख की तू चाह ना कर, बुलंद कर अपने आप को
भूल जा राहों को गिनना, भटकन तेरी किस्मत में है

आत्मविश्वास की इस डोर में, ना डाल कोई गांठें कभी
उठने की तू आदत बना ले, गिरना तेरी किस्मत में है

चुपचाप यूं ना बैठ तू, दिल की उम्मीदे हार कर
मिलकर तुझको रहेगा, जो भी तेरी किस्मत में है

छोड़ दे आदत पुरानी, हर चीज को ही लपकने की
रख तू अभी पेट खाली, धक्के खाना तेरी किस्मत में है

रुकने का तू नाम ना ले, बस चलता ही चल 'विभोर'
एक बात तू समझ ले, बदकिस्मती तेरी किस्मत मैं है।

-विभोर गुप्ता

Sunday, June 12, 2011

तानाशाही सत्ता की जय हो


 अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा
भ्रष्टाचार और कालेधन पर अपना मुंह नही खोलूँगा

अरे, मुझको भी तो अपनी जान बहुत प्यारी है
सच लिखने की ताकत मेरी, सत्ता के आगे हारी है
तो भला मैं, क्यूँ सच बोल कर अपना शीष कटाऊ
अमानवीय सरकार को भला क्यूँ अपना दुश्मन बनाऊ

जो सत्ता सोये हुए लोगो पर लाठी बरसा सकती है
न्याय की प्यासी जनता को बूँद-बूँद तरसा सकती है
जिसने सत्याग्रह का अर्थ ही कभी ना जाना हो
लोकतंत्र में जनता की पुकार को कभी ना माना हो

जिसे दुनिया ने पूजा सदा, वो उसको ठग बतलाती है
आधी रात को लाठिया बरसा मन ही मन मुस्काती है
वो सत्ता भला कलम की ताकत को क्या जानेगी
भ्रष्टाचार से पीड़ित प्रजा के आंसू क्या पहचानेगी

सत्ता के धर्म-अधर्म को अपनी कलम से नही तोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा

आज चली है लाठिया, कल गोली भी चलवा सकते है
सच लिखने के अपराध में मुझे भी अन्दर करवा सकते है
तानाशाह हो चुकी सरकार अब प्रजातंत्र को भूल रही
भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार, सत्ता के मद में झूल रही

सिंहासन का राजा कोई, बागडोर किसी और के हाथ में
खरगोशों का शिकार कर रहे, सिंह-सियार दोनों साथ में
कसाब खा रहा बिरयानी, सत्याग्राही लाठिया है खा रहे
देश में आतंक फ़ैलाने वाले, लादेन जैसे सत्ता को भा रहे

सात समंदर पार, सत्ता के दलालों की भर रही है तिजोरिया
और एक योगगुरु को द्रोही बतलाकर कर रहे वो मुंहजोरिया
अब तो लगता है डर, कहीं ना कर दे मुझको भी बदनाम
मैं क्यूँ पडू इस झंझट में, करूँगा मैं सत्ता को सलाम

सिंहासन के फेंके सिक्कों पर, अब तो मैं भी डोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा

अपनी जेब भरने को, मैं दरबारों की जेबे टटोलूँगा
अपनी कडवा सच की कविताओं में झूठ की मिश्री घोलूँगा
अब तो मैं भी सत्ता के विरुद्ध कभी कुछ नही बोलूँगा
भ्रष्टाचार और कालेधन पर अपना मुंह नही खोलूँगा

-विभोर गुप्ता (9319308534)

Wednesday, June 1, 2011

भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह

सत्याग्रह है एक युद्ध, काले धन के विरुद्ध
         इस युद्ध में जीवन आहुतियाँ डालने चलो
घायल  माँ भारती, आज तुम्हे पुकारती
         भारती के पैर के कांटे निकालने चलो
जागो युवा नौजवानों, शूरवीर बलवानों
         सिंहासन की बागडोर तुम सँभालने चलो
लगी है दावानल आग, देश के भविष्य जाग
         मिटाना है अँधियारा तो आग उछालने चलो

काँप उठा है आज कंस, खत्म करो उसका वंश
         सुदर्शन चक्र लेकर कृष्ण भगवान चलो
पाप का नाश करो, जन-जन में उल्लास भरो
        रावण की लंका जलाने को हनुमान चलो
अधर्म के विरुद्ध जंग, बाबा रामदेव के संग
        लालबहादुर कह रहे, जवान और किसान चलो
क्रांति की चली हवा, हर तरफ है धुंआ
        परिवर्तन चाहते हो तो रामलीला मैदान चलो

-विभोर गुप्ता (9319308534)

Sunday, May 29, 2011

बदनाम जिन्दगी

मैं ये तुमको क्या बताऊँ, जिन्दगी किसके नाम है,
समझना है तो यूं समझ लो, जिन्दगी बदनाम है

वक़्त है ठहरा, है ठहरें जमीं और आसमां
दिन निकलता ही नहीं, हर पल यहाँ बस शाम है

सोचा उनको तो सुना दें, हाल दिल की बेबसी का,
सुनकर वो हंसने लगे, ये तो किस्सा-ए-आम है

छाई थी एक खुमारी, उनके आँखों के नशे की,
पर वो तो ये समझ लिए, पिये हुए हम जाम है
- विभोर गुप्ता

Sunday, May 15, 2011

चौ. महेंद्र सिंह टिकैत को समर्पित


बाबा, आखिर तुम  हमें छोड़  कर चले गये
कैंसर  की बीमारी के हाथों, आखिर छले गये

सत्ता-सिंहासन की लाठी के आगे भी तुम थे कभी डरे नही
लाखों चोटें खायी, पर  आँखों से आंसू कभी भी झरे नही
कीमत लाख लगायी भले हो,  तुम थे जो कभी बिके नही
शासन ने कितना ही हो झुकाया, तुम थे जो कभी झुके नही
तुम्हारे पालन में, गरीब किसान थे पले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

किसानो के मसीहा थे तुम,  दर्द था तुमने खूब पहचाना
किसानो के हक़ में, कभी धरने  देना, कभी लाठी खाना
मंच पर खड़े होकर, किसान-क्रांति का वो बिगुल बजाना
अपनी हठ-जिद के आगे, प्रशासन को नाको चने चबाना
किसान-संघर्ष को छोड़, क्यों तुम चले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा, तुम   बिन सूना  किसान-भवन,  है तुम्हे पुकार रहा
आ जाओ एक बार फिर, किसान दलालों से फिर है हार रहा
हुक्के की  गुड-गुड, पत्तल  का खाना,  तेरी राह निहार रहा
लौट के आजा फिर से बाबा, अँधेरा फिर दीपक को मार रहा
आँखों में  छोड़ आंसू,  तुम  तो  भले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा छोड़ गये हमको, लगा जैसे एक युग का अंत हुआ
आंसू  झरने लगा  है श्रावन,  पतझड़  जैसा  बसंत हुआ
किसान चेतना को भभकाकर, अमर कोई एक पंथ हुआ
जनसैलाब को दे सन्देश, विदा दुनिया से कोई संत हुआ
लगता है सूर्यदेव, नील गगन में  ढले गये
बाबा, आखिर तुम हमें छोड़ कर चले गये

बाबा, आखिर तुम  हमें छोड़  कर चले गये
कैंसर  की बीमारी के हाथों, आखिर छले गये

Monday, May 9, 2011

अब भारत की बारी-

(अभी हाल ही में अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया है, पूरे देश में जैसे एक ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी, हमारे देश के समस्त न्यूज़ चैनल अमेरिका की इस जीत पर ख़ुशी के ढोल बजाने लगे. परन्तु मैं सोचता हूँ इस तरह ढोल बजाने का हमारा कोई मतलब नही है, क्योंकि हमारी जेलों में सैकड़ों आतंकवादी आज भी बंद है, पर हमारी सरकार उन्हें आज तक भी कोई सजा नही दिला सकी है, और अफज़ल जैसे आतंकी जिसे फाँसी की सजा भी मिल चुकी है, उसे आज भी जेल में मटन और बिरयानी परोसी जा रही है. जब हम अपनी जेलों में कैद आतंकियों को भी सजा नही दे पा रहे है, तो हमें एक लादेन के मरने पर इतनी ख़ुशी क्यों हो रही है? जिस दिन जेल में पड़े सभी आतंकवादियों को सजा मिलेगी, वो दिन हमारे ढोल बजाने का दिन होगा, और उस दिन शायद मैं भी खुशियों के ढोल बजाऊंगा.
मैं एक रचना प्रस्तुत करता हूँ, अगर आपके दिल तक मेरे एहसास पहुंचे तो मुझे अवश्य सूचित करे.)



अब तो अमेरिका ने ओसामा को भी मार दिया
और पाकिस्तानी चेहरे से भी नकाब उतर दिया
तो तुम क्यों बैठे हो चुपचाप आतंकी कडवाहट को चख कर
अफज़ल की  फाईल  को  राष्ट्रपति  की तिजोरी  में रख कर
अब तो तुम भी अफजल को फांसी देकर न्याय करो
उसको क्षमादान देकर न देश के साथ  अन्याय करो
तुम कसाब को जेल  में  बिरयानी जो  खिला रहे हो
उसकी सुरक्षा पर रूपया पानी की तरह जो बहा रहे है
ये नही है कोई बड़प्पन, बल्कि मुंह पर तमाचे है
लकड़ी के महल को  दीमक खा जाने वाले ढांचे है
कल कोई फिर विमान अपहरण कर तुमको धमकाएगा
विमान की रिहाई के बदले में  कसाब को मुक्त कराएगा
मत भूलो, पाकिस्तान ने भारत में आतंकी बीज बोये है
पिछले बीस सालों में हमने अस्सी हज़ार व्यक्ति खोये है
जवान बेटों की लाशें बूढ़े बापों के कन्धों ने भी ढोयी है
ना जाने  कितने सुहागनों  की आँखें  गम  में  रोई  है
उनके आंसुओं को भूलकर, तुम क्यों  ढोल बजा  रहे हो
एक ओसामा के मरने पर इतनी ख़ुशी क्यों मना रहे हो
यदि  तुम  इन आतंकी दरिंदों पर लगाम नहीं कस पायोगे
तो भारत की गलियों में एक नही दस-दस ओसामा पाओगे
तब तुम याद करोगे अपनी पिछली सब भूलों को
कैसे  पाला-पोषा था, तुमने  काँटें लदे  बबूलों  को
अब भी समय  है जागो, दुष्ट  पापियों का संहार  लिखो
राक्षसों के खून को प्यासी माँ भवानी की तलवार दिखो
क्षमादान देकर मत  पृथ्वीराज वाली भूल को दोहराओ
आतंक का  नाश कर वीर  शिवाजी के वंशज कहलाओ
कह  दो  सागर के  लहरों से, कह  दो  क्रूर  हवाओं  को
आँख उठा कर भी न देख ले कोई भारत की सीमाओं को
जागो मनमोहन पगड़ी सभाल कर जट सरदार बनो
लेकर  कृपाण  आतंकी  दुष्ट हवाओं  पर प्रहार  बनो
हिजबुल लश्कर के आगे अपनी पूंछ हिलाना बंद करो
आस्तीन  के जहरीले नागों को दूध पिलाना बंद करो
फिर ना संसद पर हमला हो, फिर ताज ना घायल हो
ट्रेन के  बम धमाके में, फिर  ना रोती कोई पायल हो
फिर ना कोई अपहरण कर आतंकियों को छुड़ाने की मांग आएगी
गर जेलों में  बंधक आतंकियों  की गर्दन  फाँसी पर टांगी जाएगी
मत रहना  इस भूल  में, अमेरिका  तुम्हारे  साथ होगा
मिटने आतंकी अंधियारे को, उसका भी कोई हाथ होगा
किसने पोंछा है पसीना, आक्रोश में दहकते अंगारों का
शेर  अकेला  ही शिकार  किया  करता  है  सियारों का
तो तुम एक बार  पुराने  असहाय दुर्बल  कानूनों को  झटका दो
अफज़ल, कसाब समेत सभी आतंकियों को शूली पर लटका दो
और तुम  सेना से  कह दो, माँ काली का रौद्र  रूप धरे
जहाँ मिले जो आतंकी, उसकी गर्दन धड से अलग करे
तो लाहौर, कराची, रावलपिंडी तक सेना को बढ़ जाने  दो
सीमा पार  आतंकी अड्डों पर  रणचंडी  को चढ़  जाने दो
दिखला दो  एक बार  दुष्ट पडौसी को उसकी औकात
काट डालो जिह्वा उसकी गर करे वो कश्मीर की बात
ओसामा की मौत पर  भारत  में जो  मातम  मना  रहे  है
और ओसामा-बिन-लादेन को अपना सुपर हीरो बना रहे है
उनको भी तुम एक बार उनकी औकातें दिखला  दो
राष्ट्रद्रोह की कोशिशों का परिणाम  उनको बतला दो
फिर देखो भारत  पर  कोई आतंकी  हमला  कैसे  हो  सकता है
और भारत की पवन भूमि पर कोई विष बीज कैसे बो सकता है
खात्मा कर आतंक का जन-जन में खुशियों के दीप जलाओ
और फिर पूरी दुनिया में अपनी  जीत के तुम  ढोल बजाओ


-विभोर गुप्ता (मोदीनगर)

Tuesday, May 3, 2011

छंद (मनमोहन-सोनिया वाद)

घोटालों के हंगामों के बाद मनमोहन बोले,
           मैडम जी, ये मेरे माथे कैसी मजबूरी है
चाहे कहीं कुछ हो, चाहे कोई घोटाला करे,
           दोषियों में नाम मेरे आना जरूरी है
मेरे गले का पट्टा तो आपके है हाथ में,
          फिर विपक्षी पार्टियों की ये कैसी मगरूरी है
आपको तो कोई कुछ कहता नही है, बस
         मेरे माथे पर ही सारा कलंक लगाना जरूरी है

बोली सोनिया जी, शांत हो जाओ मुन्ना मेरे,
       मजा तो तभी आता है राजनीति के खेल में
सिंह-सिंह आपस में ही बस लड़ते रहे,
       और लोमड़ी-सियार रहे एक दूजे के मेल में
आपको तो लोग बस गलियां ही देते रहे,
       तारीफ तो हो मेरी, शहर-गाँव, बस-रेल में
दोषी तो मजे लूटते रहे निज बंगलों में,
     और निर्दोषियों को कूटती रहे पुलिस जेल में.